शिवधाम में पहुंचता है ये रहस्यमयी कछुआ, प्रसाद लेकर लौटता है जंगल, ये है मंदिर की महिमा

Newsbeat उत्तराखंड खबर हटकर ट्रेंडिंग खबरें ताज़ा ख़बरें न्यूज़ सोशल मीडिया वायरल

ढिकुली गांव में स्थित गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर एक कछुआ सालों से शीश नवाने पहुंचता है. ईटीवी भारत के लिए कैलाश सुयाल की रिपोर्ट

रामनगर (उत्तराखंड): नैनीताल जिले के रामनगर क्षेत्र के ढिकुली गांव में स्थित गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर इन दिनों अपनी प्राचीन धार्मिक मान्यता के साथ-साथ एक बेहद अनोखी वजह से भी चर्चा में है. कॉर्बेट क्षेत्र के बफर जोन में जंगल और नदी-नालों के बीच स्थित इस प्राचीन मंदिर में पिछले कई वर्षों से शाम ढलते ही एक विशालकाय कछुआ पहुंच रहा है, खास बात यह है कि कछुए के मंदिर पहुंचने का समय लगभग निर्धारित है और उसका आने-जाने का रास्ता भी मानो तय है. मंदिर पहुंचने के बाद वह कुछ समय वहां रुकता है और प्रसाद मिलने के बाद वापस अपने रास्ते जंगल की ओर चला जाता है.

आस्था से जोड़कर देख रहे लोग: यह अनोखी घटना स्थानीय लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनी हुई है, कुछ लोग इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते हैं और मानते हैं कि कछुआ भगवान शिव के दर्शन के लिए मंदिर पहुंचता है. वहीं कुछ लोगों का कहना है कि मंदिर में मिलने वाला प्रसाद ही उसे बार-बार यहां खींचकर लाता है. यही वजह है कि अब कई लोग इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए शाम के समय मंदिर पहुंचने लगे हैं.

महाभारत काल से जुड़ी है मंदिर की मान्यता: गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर को लेकर स्थानीय स्तर पर कई प्राचीन मान्यताएं प्रचलित हैं. जनश्रुतियों के अनुसार इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इस क्षेत्र में प्रवास किया था और इसी दौरान यहां शिवलिंग की स्थापना की गई थी. स्थानीय मान्यता में इस शिवलिंग की स्थापना महाबली भीम द्वारा किए जाने की बात कही जाती है. यही वजह है कि यह मंदिर स्थानीय लोगों के लिए केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि क्षेत्र की प्राचीन सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल भी माना जाता है. कॉर्बेट क्षेत्र के जंगलों के बीच स्थित होने के कारण मंदिर की प्राकृतिक और धार्मिक दोनों ही विशेषताएं इसे अलग पहचान देती हैं.

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि कछुआ किसी सामान्य वन्यजीव की तरह अचानक मंदिर के आसपास दिखाई नहीं देता, बल्कि उसका एक निर्धारित रास्ता और लगभग निश्चित समय नजर आता है. कछुआ शाम के समय मंदिर की ओर आता है, मंदिर में मौजूद साधु संतों द्वारा उसे प्रसाद दिया जाता है और प्रसाद लेने के बाद कुछ समय बाद वह वापस उसी रास्ते से चला जाता है.
-संजय छिम्वाल, वन्यजीव प्रेमी

सालों से तय समय पर मंदिर पहुंच रहा कछुआ: ढिकुली निवासी और वन्यजीव प्रेमी संजय छिम्वाल का कहना है कि संभव है कि कछुआ आसपास मौजूद किसी तालाब या जलस्रोत से निकलकर मंदिर तक पहुंचता हो. कछुए को रेप्टाइल यानी सरीसृप माना जाता है और आमतौर पर सरीसृपों की सीखने और पहचानने की क्षमता स्तनधारी पशुओं या पक्षियों की तरह विकसित नहीं मानी जाती. ऐसे में वर्षों तक किसी एक स्थान पर एक निर्धारित समय में पहुंचना अपने आप में बेहद रोचक घटना है. उनके मुताबिक इसे सीधे तौर पर धार्मिक आस्था से जोड़ना अलग विषय है, लेकिन यह जरूर है कि कछुए ने मंदिर तक पहुंचने वाला एक रास्ता जैसे याद कर लिया है. वहां उसे भोजन भी मिलता है और वह फिर उसी रास्ते वापस लौट जाता है, यही व्यवहार इस पूरे मामले को और रहस्यमयी बना देता है.

कछुए का लगातार कई वर्षों से निर्धारित समय पर मंदिर पहुंचना निश्चित रूप से अध्ययन का विषय है. यदि कछुआ भोजन की तलाश में मंदिर पहुंच रहा होता तो मंदिर में मिलने वाला प्रसाद उसके प्राकृतिक भोजन का हिस्सा नहीं माना जाएगा. ऐसे में केवल भोजन को उसके मंदिर आने का कारण मान लेना उचित नहीं होगा. इसके पीछे कोई दूसरा व्यवहारिक या पर्यावरणीय कारण हो सकता है.
-डॉ. एमसी पांडे, प्राचार्य, रामनगर पीएनजीपीजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय-

डॉ. एमसी पांडे के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कछुआ पहली बार मंदिर तक कैसे पहुंचा और किन परिस्थितियों में उसने इस रास्ते को अपनाया, लंबे समय तक एक ही रूट पर उसका आना-जाना यह संकेत देता है कि इस व्यवहार को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि वन्यजीव विशेषज्ञ और वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से यह पता लगा सकते हैं कि कछुआ किस आधार पर अपना रास्ता और समय निर्धारित करता है.

वर्तमान समय में मानसून का दौर चल रहा है और इस मौसम में कछुए समेत कई सरीसृप अपने ठिकानों से बाहर निकलते हैं. गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर नदी-नालों के आसपास वन क्षेत्र में स्थित है, ऐसे में कछुए का इस क्षेत्र में निकलना असामान्य नहीं है. मंदिर में उसे कुछ खाने-पीने की सामग्री मिल जाती होगी, जिसके कारण वह वहां पहुंचता हो, हालांकि वन विभाग की प्राथमिकता वन्यजीवों का संरक्षण और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है.
-बिंदर पाल सिंह, वार्डन, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व-

आस्था, संयोग या शोध का विषय: गरल कंठेश्वर महादेव मंदिर में पहुंचने वाला यह विशालकाय कछुआ अब स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का केंद्र बन चुका है. किसी के लिए यह भगवान शिव के प्रति आस्था का अनोखा उदाहरण है तो किसी के लिए यह जंगल में रहने वाले एक जीव का वर्षों से चला आ रहा प्राकृतिक व्यवहार.सबसे दिलचस्प बात यह है कि कछुआ मंदिर तक आता है, कुछ समय रुकता है, प्रसाद प्राप्त करता है और फिर अपने निर्धारित रास्ते से वापस चला जाता है.

अध्ययन से मिल सकते हैं सवालों के जवाब: यह सिलसिला एक-दो दिन का नहीं, बल्कि कई तीन-चार सालों से देखा जा रहा है. हालांकि इस पूरे मामले को धार्मिक चमत्कार मानने से पहले वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसका अध्ययन किया जाना जरूरी है, यदि विशेषज्ञ इस कछुए की आवाजाही, उसके रूट, समय, आसपास के जलस्रोत और उसके भोजन व्यवहार का अध्ययन करें तो संभव है कि इस रहस्यमयी कहानी के पीछे छिपे कई सवालों के जवाब मिल सकें.

शिवधाम लोगों की आस्था का केंद्र: फिलहाल ढिकुली का यह प्राचीन मंदिर जहां पांडवकालीन मान्यताओं और भगवान शिव की आस्था के लिए जाना जाता है. वहीं शाम होते ही मंदिर की ओर बढ़ता यह विशालकाय कछुआ इसकी कहानी में एक नया और बेहद रोचक अध्याय जोड़ रहा है.

Social Media Share