ग्लेशियरों के साथ बारिश भी त्रासदी का कारण है. वैज्ञानिकों का कहना है पिछले कुछ आपदाएं इन आपदाओं का उदाहरण है. रिपोर्ट- रोहित सोनी
देहरादून: नेपाल में आई भीषण त्रासदी के बाद अब देश दुनिया में हिमालय से संभावित आने वाली त्रासदी को लेकर नए सिरे से चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है. इसके पीछे की मुख्य वजह है कि नेपाल में आई त्रासदी हिमालय राज्यों के लिए एक बड़ी चेतावनी है. हालांकि, नेपाल में आए त्रासदी की तरह ही उत्तराखंड में पूर्व में आई आपदाओं में बारिश का महत्वपूर्ण कनेक्शन देखा गया है. इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग और अनियंत्रित विकास के साथ ही उच्च हिमालयी क्षेत्र में इंसानों की पहुंच शामिल है. आइए जानते हैं कि उच्च हिमालय क्षेत्रों से आने वाली आपदा का बारिश से क्या कनेक्शन है.
नेपाल देश में आई भीषण त्रासदी के बाद देश-दुनिया में हिमालयी क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर नए सिरे से चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है. वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल की ये त्रासदी उत्तराखंड समेत अन्य हिमालयी राज्यों के लिए एक बड़ा अलर्ट है. ऐसे में नेपाल की त्रासदी से सबक लेते हुए हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों का नए सिरे से अध्ययन करने की जरूरत है. उत्तराखंड में साल 2013 में आई केदारनाथ आपदा या फिर 2021 की चमोली (रैणी) त्रासदी, इन सभी में बारिश और तेजी से बदलते मौसम चक्र का सीधा कनेक्शन देखा गया. अत्यधिक बारिश, तेजी से पिघलते ग्लेशियर ने हिमालय को काफी अधिक संवेदनशील बना दिया है.
ग्लोबल वार्मिंग ने बदला चक्र: ग्लोबल वार्मिंग आज देश दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. क्योंकि इसकी वजह से न सिर्फ ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं बल्कि हिमालयी क्षेत्रों में प्रेसिपिटेशन (Precipitation Pattern) में भी बड़ा बदलाव आया है. जिस कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों यानी करीब 4 हजार मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जहां पहले सिर्फ बर्फबारी होती थी, ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अब मूसलाधार बारिश का दौर देखा जा रहा है. इसके अलावा, ग्लोब का तापमान बढ़ने के कारण वायुमंडल में नमी सोखने की क्षमता बढ़ गई है, जिससे बादलों के फटने या कम समय में बहुत तेज बारिश की घटनाएं भी तेजी से बढ़ती जा रही हैं.

जल प्रलय का कारण: उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हो रही बारिश अब नीचे की घाटियों के लिए विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन में तब्दील हो रही है. दरअसल, ग्लेशियरों के पिघलने या फिर पीछे खिसकने से पहाड़ों पर भारी मात्रा में मोरेन मलबा (Moraine Debris) जमा हो जाता है. ऐसे में जब इन क्षेत्रों में भारी बारिश होती है, तो ये लूज मलबा पानी सोखकर भारी हो जाता है और फिर अचानक भूस्खलन का रूप ले लेता है. इसके साथ ही कई बार अत्यधिक बारिश से होने वाले भूस्खलन नदियों का रास्ता रोककर कृत्रिम झीलें भी बना देते हैं. ऐसे में जब इन कृत्रिम झीलें पर पानी का दबाव बढ़ता है तो ये अस्थायी बांध टूट जाते हैं, जो नीचें के क्षेत्रों में भारी तबाही मचाते हैं.
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक डॉ. विनीत कुमार गहलोत ने कहा कि, जितनी भी आपदाएं आती हैं जिसमें लैंडस्लाइड, ग्लोफ (GLOF), ग्लेशियर ब्रेकऑफ, मोरेन ब्रेकऑफ शामिल है, वो अमूमन मॉनसून सीजन के दौरान होती है. लैंडस्लाइड का सीधा कनेक्शन मॉनसून सीजन से होता है, क्योंकि भूस्खलन घटना की सालाना संख्या देखी जाए तो मॉनसून के दौरान संख्या अधिक होती है. जैसे ही बारिश शुरू होती है, प्राकृतिक आपदाओं की संख्या बढ़ने लग जाती है. हालांकि, पहले उच्च हिमालय क्षेत्रों में बारिश नहीं होती थी, लेकिन अब वहां पर बारिश हो रही है. जबकि आपदा की अधिकांश घटनाएं उच्च हिमालय क्षेत्र से ही शुरू होती है, ऐसे में अगर वहां पर भारी बारिश अधिक होगी तो प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ाने की भी उम्मीद है.
उच्च हिमालय क्षेत्र में मानवीय गतिविधियां बढ़ गई हैं, जिससे क्लाइमेट चेंज हो रहा है, ये कहना ठीक नहीं है. क्योंकि, क्लाइमेट चेंज का इफेक्ट ग्लोबल लेवल पर होता है, जिसमें सब लोग और हर जगह के लोग शामिल हैं. पहले बारिश 4 हजार मीटर तक होती थी, अब वह बारिश उच्च हिमालय क्षेत्र में भी होने लगी है. क्योंकि क्लाइमेट चेंज की वजह से एयर सर्कुलेशन चेंज हो गया है, साथ ही मॉनसून पैटर्न में भी बदलाव आया है. ऐसे में उच्च हिमालय क्षेत्र पर बारिश का होना, सीधा क्लाइमेट चेंज से जुड़ा हुआ है और उसके लिए पूरा विश्व जिम्मेदार है.
-डॉ. विनीत कुमार गहलोत, निदेशक, वाडिया इंस्टीट्यूट-
इस विषय पर वाडिया इंस्टीट्यूट के ही सीनियर साइंटिस्ट डॉ. मनीष मेहता ने कहा कि, 3600 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले जितने भी क्षेत्र हैं, वहां का मटेरियल, रिवॉक मटेरियल है. यानी ग्लेशियर द्वारा लाया गया और डिपाजिट किया गया मेटेरियल, जो काफी अधिक लूज है. ऐसे में अगर इस क्षेत्र में भारी बारिश होती है तो वो बारिश के साथ ही यह लूज मटेरियल नीचे चलता है. उच्च हिमालय क्षेत्रों पर अधिकांश जो वैली है, वो काफी अधिक संकरी है. ऐसे में बारिश के साथ आया ये लूज मटेरियल इन वैली के संकरी गलियों में डिपॉजिट हो जाता है.
विश्व भर के लिए चुनौती बनी ग्लोबल वार्मिंग की वजह से रेनफॉल पैटर्न में काफी अधिक बदलाव हुआ है. जिस कारण रेनफॉल अपर रीजन की तरफ शिफ्ट कर गया है. यानी पहले 2 हजार मीटर तक बारिश होती थी, लेकिन अब वह शिफ्ट होकर 3 हजार मीटर तक पहुंच गई है. जबकि 3 हजार मीटर और उससे अधिक ऊंचाई पर स्नोफॉल हुआ करता था. हिमालय, मॉनसून को रोकता है और उस क्षेत्र में गर्मी होने के कारण वहीं पर ही भारी बारिश होने लग जाती है. बढ़ती गर्मी और भारी बारिश की वजह से रॉक्स के दरारों में पानी भर जाता है, जिस कारण रॉक्स की सहन क्षमता कम हो जाती है और वो टूटकर नीचे आ जाती है.
-डॉ. मनीष मेहता, सीनियर साइंटिस्ट, वाडिया इंस्टीट्यूट-
डॉ. मनीष ने कहा कि, इसके अलावा, ग्लोबल वार्मिंग की वजह से ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं. भारी बारिश के कारण झील में पानी तेजी से बढ़ रहा है. पहले जिस झील को भरने में 6 महीने का समय लगता था, वर्तमान समय में इस झील को भरने में लगभग एक हफ्ते का ही समय लग रहा है. जिस कारण झील टूट जाती है. ऐसे में उच्च हिमालय क्षेत्रों में आपदा की घटनाओं को बढ़ाने में भारी बारिश का होना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.
धारली आपदा के दौरान डाउनस्ट्रीम में कम बारिश हुई थी, लेकिन जो रिपोर्ट की गई, उसके अनुसार धराली के ऊपर हायर रीजन में काफी अधिक बारिश हुई थी. ऐसी कुछ स्थिति नेपाल में भी बनी थी, जहां के डाउनस्ट्रीम में कम बारिश हुई थी, लेकिन हायर रीजन में काफी अधिक बारिश हुई थी, जिस कारण इतनी बड़ी त्रासदी आई.
-डॉ. मनीष मेहता, सीनियर साइंटिस्ट, वाडिया इंस्टीट्यूट-