आदमखोरों ने वन विभाग के ‘चक्रव्यूह’ का निकाला तोड़, पिंजरे और बंदूकें दोनों फेल, कैट फैमिली हुई ‘चालाक’

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पहाड़ों को आतंकित करने वाले आदमखोर इतने स्मार्ट हो गए हैं कि अब वो वन विभाग के हाथ भी नहीं आ रहे. रिपोर्ट- नवीन उनियाल.

देहरादून: उत्तराखंड में खूंखार आदमखोर वन विभाग के ट्रैप का हर पैंतरा समझ चुके हैं. शायद यही कारण है कि आदमखोर शिकारियों के लिए बिछाया गया हर चक्रव्यूह बेकार साबित हो रहा है. ऐसा कहने के पीछे की बड़ी वजह वन विभाग के वह आंकड़े हैं, जो इस ओर इशारा कर रहे हैं. हालांकि, खूंखार शिकारियों के वन विभाग की गिरफ्त से दूर रहने के पीछे एक्सपर्ट्स दूसरे कई कारण भी मानते हैं. जानते हैं कैसे आदेशों के बाद भी उत्तराखंड में वन विभाग शिकारी वन्यजीवों को नहीं पकड़ पा रहा है.

पहाड़ों में कई इलाकों को आतंकित करने वाले आदमखोर वन्यजीव महकमे से एक कदम आगे निकल चुके हैं. विभाग के पिंजरे ही नहीं, बल्कि बंदूकों की गोलियो को भी ये शिकारी क्षण भर का मौका नहीं दे रहे. यही कारण है कि जंगली जानवरों को ढूंढने या आसपास होने के बाद भी उन्हें पकड़ने में वन विभाग कामयाब नहीं हो पा रहा.

एक साल में 55 खूंखार शिकारी ही वन विभाग के हाथ आए: वन विभाग से मिले आंकड़ों की बात करें तो पिछले एक साल में कुछ इसी तरह की स्थितियां राज्य में दिखाई दे रही हैं. पिछले एक साल में कुल 106 शिकारी वन्यजीवों को ट्रेंकुलाइज कर पिंजरे में बंद करने के आदेश दिए गए हैं, जिसमें से केवल 55 खूंखार वन्यजीव ही पकड़े जा सके हैं. इनमें भी केवल 29 को रेस्क्यू सेंटर भेजा गया, जबकि बाकियों को यानी 26 को वापस जंगलों में ही छोड़ दिया गया.

एक तिहाई आदमखोर जानवरों को ही मार पाई टीम: चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन की तरफ से इसी तरह कुल 13 खूंखार शिकारी वन्यजीवों को मारने के भी आदेश दिए गए, जिसके बाद वन विभाग की टीम मौके पर गई और आसपास खूंखार जंगली जानवर को ढूंढने का भी प्रयास भी किया. कई मामलों में तो टीमों को शिकारी वन्यजीव दिखाई भी दिया, लेकिन इन्हें मारा नहीं जा सका. आंकड़ों के रूप में देखें तो 13 में से केवल चार आदमखोर वन्यजीवों को वन विभाग की टीम मार पाई, यानी एक तिहाई से भी कम आदमखोर मारे जा सके.

कुछ आंकड़ों पर एक नजर:

  • वन विभाग में नैनीताल वन प्रभाग में दो आदमखोरों को मारने का आदेश दिया, लेकिन एक को भी नहीं मारा जा सका.
  • लैंसडाउन वन प्रभाग में भी एक आदमखोर जंगली जानवर को मारने का आदेश हुआ, लेकिन वह भी विभाग के हाथ नहीं आया.
  • पौड़ी वन प्रभाग में कुल आठ वन्यजीवों को मारने के आदेश हुए, जिसमें से तीन में वन विभाग को कामयाबी मिली. यानी तीन आदमखोर मारे गए.
  • रुद्रप्रयाग में दो आदमखोर जंगली जानवरों को मारने के आदेश हुए और इसमें से एक ही वन विभाग की बंदूक की गोली का निशाना बना.

जानिए पिंजरे में कितने शिकारी कैद हो पाए: इसी तरह इन्हीं आंकड़ों को पिंजरे में पकड़ने के आदेश के रूप में देखें तो-

  • नैनीताल में सात में से पांच को ही पिंजरे में कैद किया जा सका.
  • अल्मोड़ा में 33 में से केवल 12 शिकारी वन्यजीवों को वन विभाग की टीम पकड़ पाई.
  • बागेश्वर में नौ में से दो को ही पकड़ा गया.
  • तराई पश्चिम में 13 में से चार जंगली जानवर पकड़े जा सके.
  • देहरादून में तीन जंगली वन्यजीवों को पकड़ने का आदेश आया था, लेकिन एक भी हाथ नहीं आया.
  • इसी तरह लैंसडाउन में चार में से दो को विभाग पकड़ पाया.
  • उधर टिहरी और अपर यमुना बड़कोट में एक-एक शिकारी वन्यजीवों को पकड़ने के आदेश हुए, लेकिन दोनों जगह पिंजरे में ये खूंखार वन्यजीव नहीं आ सके.
  • यही स्थिति हरिद्वार की भी रही, जहां सात खूंखार वन्यजीवों को पकड़ने की इजाजत मिली, लेकिन कोई शिकारी वन्य जीव नहीं पकड़ा गया.

क्या कहता है वन विभाग: इस मामले में ईटीवी भारत ने जब वन विभाग से सवाल पूछा तो मुख्य वन संरक्षक गढ़वाल धीरज पांडेय ने बताया कि शिकारी वन्यजीवों को पकड़ना बेहद मुश्किल होता है. उत्तराखंड में पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण न सिर्फ वन्यजीवों का पता लगाना मुश्किल होता है, बल्कि जंगलों के भीतर इन्हें निशाना बनाना भी चुनौती पूर्ण होता है.

कोई भी जंगली जानवर खासकर कैट फैमिली के काफी संवेदनशील और चालक होते हैं. लेपर्ड और टाइगर जैसे जानवर तो काबू करने में काफी ज्यादा मुश्किल आती है. क्योंकि यह दोनों ही वन्यजीव काफी जल्दी खतरे को भांप जाते हैं.
– धीरज पांडेय, मुख्य वन संरक्षक गढ़वाल –

वन विभाग अधिकांश खूंखार जानवरों को पकड़ पाने में क्यों नाकाम हो रहा है. इस पर भी मुख्य वन संरक्षक गढ़वाल धीरज पांडेय ने विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि,

हर जानवर को पकड़ने की एक एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) होती है. जैसे लेपर्ड और टाइगर दोनों के लिए अलग-अलग नियम है. किसी भी जानकार को ट्रेंकुलाइज करने के लिए उसकी निर्धारित दूरी पर पहुंचना जरूरी होता है. कई बार हम जानवर को देख पाते हैं, लेकिन वो हमारी रेंज में नहीं होता है, तो उस स्थिति में जानवर को ट्रेंकुलाइज नहीं किया जा सकता है. कई बार वो रेंज में भी होता है, लेकिन ऐसी स्थिति बन पाती है कि उस जानवर को ट्रेंकुलाइज किया जा सके. जैसे घास बहुत ज्यादा होने के कारण विजन साफ नहीं मिलता.
– धीरज पांडेय, मुख्य वन संरक्षक गढ़वाल –

इस मामले में आंकड़ों के आधार पर यह भी साफ है कि प्रदेश में शिकारी वन्यजीव वन विभाग की गतिविधियों और उनकी कार्यप्रणाली से भी काफी ज्यादा अभ्यस्त हो चुके हैं. ऐसे में इन्हें पकड़ना और भी ज्यादा मुश्किल हो गया है.

इन शिकारी वन्यजीवों को नहीं पकड़ पाने के पीछे एक नहीं कई कारण है, लेकिन जाहिर तौर पर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने के बाद शिकारी वन्यजीव ज्यादा चौकन्ना हो जाता है. गुलदार बेहद शातिर वन्य जीव है, जोकि बेहद समझदारी और तेजी के साथ अपनी जगह बदलता है. इंसानों की गतिविधियों के आधार पर अपनी आवाजाही को परिवर्तित कर देता है.
– एसके सिंह, रिटायर्ड अधिकारी, भारतीय वन सेवा –

भारतीय वन सेवा के रिटायर्ड अधिकारी एसके सिंह की मानें तो जंगलों के भीतर और फिर इंसानी बस्तियां तक आने वाला गुलदार इंसानों की साइकोलॉजी को भी काफी हद तक समझ लेता है. इसी आधार पर वह अपने बिहेवियर को भी बदल लेता है. कई बार इन शिकारी वन्य जीवों के किसी क्षेत्र की कई दिनों तक रेकी करने और बस्तियों में बच्चों पर नजर रखने जैसी बातें भी सामने आती रही है. ऐसे में यह भी स्पष्ट हुआ है कि समय के साथ शिकारी वन्य जीव भी अपने व्यवहार को बदल रहे हैं और इंसानों से खुद को हो रहे खतरे के आधार पर अपनी गतिविधियों में भी बदलाव ला रहे हैं.

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